राजधानी गैरसैंण के लिए आखिरी सांस तक लड़े बाबा मोहन उत्तराखंडी
9 अगस्त 2004 उत्तराखंड के इतिहास में वह दिन है, जब गैरसैंण को राज्य की स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे बाबा मोहन उत्तराखंडी ने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन।
पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट क्षेत्र के ग्राम बठोली में वर्ष 1948 में जन्मे मोहन सिंह नेगी ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके पिता का नाम मनवर सिंह नेगी था। इंटरमीडिएट और आईटीआई की शिक्षा के बाद उन्होंने बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप में क्लर्क के रूप में नौकरी की, लेकिन सेना की नौकरी उन्हें अधिक समय तक रास नहीं आई। वर्ष 1994 के ऐतिहासिक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उन्होंने आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की।
2 अक्टूबर 1994 के मुजफ्फरनगर कांड के बाद उन्होंने आजीवन दाढ़ी और बाल न कटवाने का संकल्प लिया। इसके बाद वह मोहन सिंह नेगी से ‘बाबा मोहन उत्तराखंडी’ के नाम से पहचाने जाने लगे। उत्तराखंड राज्य और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर उन्होंने लगातार संघर्ष किया और कई बार आमरण अनशन किया।
बाबा मोहन उत्तराखंडी ने 1997 से 2004 तक गैरसैंण राजधानी समेत विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर कई स्थानों पर अनशन किए। इनमें लैंसडौन के देवीधार, सतपुली, गुमखाल, नंदाढोक गैरसैंण, पौड़ी, चौंदकोट गढ़ी, कनपुर गढ़ी, कोदिया बगड़ और बेनीताल आदिबदरी प्रमुख रहे।
2 जुलाई 2004 को उन्होंने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने समेत पांच मांगों को लेकर आदिबदरी के बेनीताल में आमरण अनशन शुरू किया। 38 दिनों तक चले अनशन के बाद 8 अगस्त की रात प्रशासन उन्हें जबरन अनशन स्थल से उठाकर अस्पताल ले जाने लगा। अस्पताल ले जाते समय 9 अगस्त 2004 को बाबा मोहन उत्तराखंडी ने दम तोड़ दिया।
उनका जीवन उत्तराखंड की क्षेत्रीय अस्मिता, गैरसैंण की राजधानी की मांग और जनहित के मुद्दों के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक बन गया। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के आंदोलन में उनके बलिदान को आज भी याद किया जाता है।
अमर शहीद बाबा मोहन उत्तराखंडी को शत-शत नमन। उनकी शहादत को कृतज्ञतापूर्वक श्रद्धांजलि।