बागेश्वर में गुलदार का हमला, मवेशी चराने गई 48 वर्षीय महिला की मौत; मानव-वन्यजीव संघर्ष पर फिर उठे सवाल
बागेश्वर: जिले की कांडा तहसील के बाझीरौट-खड़खेत क्षेत्र में मवेशी चराने गई 48 वर्षीय महिला की संदिग्ध रूप से गुलदार के हमले में मौत हो गई। घटना के समय जंगल में तेज बारिश और घना कोहरा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, झाड़ियों की ओट से अचानक निकले गुलदार ने महिला पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है।
मृतका की पहचान कमला देवी (48), पत्नी पूरन राम के रूप में हुई है। वह गांव की बारी व्यवस्था के तहत 19 परिवारों के 50 से अधिक मवेशियों को चराने जंगल गई थीं। उनके साथ उनके पति पूरन राम भी मौजूद थे। अचानक कमला देवी की चीख सुनकर पति और पास में बकरियां चरा रहे पंकज राम मौके पर पहुंचे तो कमला देवी लहूलुहान अवस्था में पड़ी मिलीं। दोनों ने घटनास्थल से एक गुलदार को भागते हुए देखने का दावा किया।
सूचना मिलने पर ग्राम प्रधान, पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है, जबकि वन विभाग ने घटनास्थल का निरीक्षण कर जांच शुरू कर दी है। प्रथम दृष्टया मामला गुलदार के हमले का माना जा रहा है, हालांकि मौत के वास्तविक कारणों की पुष्टि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही होगी।
थाना प्रभारी बलवंत कंबोज ने बताया कि पुलिस सभी पहलुओं की जांच कर रही है। वहीं प्रभागीय वनाधिकारी आदित्य रत्न ने घटना को दुखद बताते हुए कहा कि वन विभाग की टीम मौके पर मौजूद है और नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। ग्रामीणों ने क्षेत्र में सक्रिय गुलदार को जल्द पकड़ने और लोगों की सुरक्षा के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। राज्य के कई जिलों में आए दिन गुलदार, बाघ और हाथियों के हमलों में लोगों की जान जा रही है या वे गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं। इसके बावजूद स्थानीय लोगों का आरोप है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए अब तक कोई दीर्घकालिक और स्पष्ट रणनीति प्रभावी रूप से लागू होती नजर नहीं आती। वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही वाले क्षेत्रों में निगरानी, त्वरित रेस्क्यू, सुरक्षित चराई क्षेत्र, जागरूकता और संवेदनशील गांवों के लिए विशेष सुरक्षा उपायों की मांग लंबे समय से उठ रही है। कमला देवी की मौत ने एक बार फिर इस सवाल को सामने ला खड़ा किया है कि आखिर उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर स्थायी समाधान कब तक मिलेगा।