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“हम तो 78 साल से पेट्रोल-डीज़ल बचा रहे हैं…” डुमक गांव के बुजुर्ग की पीड़ा बनी सिस्टम पर बड़ा सवाल

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By Pahadnews24
May 16, 2026 • 1 min read
“हम तो 78 साल से पेट्रोल-डीज़ल बचा रहे हैं…”  डुमक गांव के बुजुर्ग की पीड़ा बनी सिस्टम पर बड़ा सवाल
“हम तो 78 साल से पेट्रोल-डीज़ल बचा रहे हैं…” डुमक गांव के बुजुर्ग की पीड़ा बनी सिस्टम पर बड़ा सवाल (Photo: Pahad News)

उत्तराखंड के चमोली गढ़वाल स्थित डुमक गांव से सामने आई 73 वर्षीय बुजुर्ग प्रेम सिंह सनवाल की बात आज पूरे शासन-प्रशासन के लिए आईना बन गई है। जब देशभर में पेट्रोल-डीज़ल बचाने की अपीलें की जा रही हैं, तब पहाड़ के इस बुजुर्ग ने एक ऐसी सच्चाई बयान की, जिसने विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।


 

प्रेम सिंह सनवाल का कहना है कि “हम तो आजादी के बाद से ही पेट्रोल-डीज़ल बचा रहे हैं… क्योंकि हमारे गांव तक आज तक सड़क ही नहीं पहुंची।”
उनकी इस एक पंक्ति में दशकों की पीड़ा, उपेक्षा और संघर्ष साफ झलकता है। डुमक गांव के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए कई किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं। गांव में लगभग 15 परिवारों के पास गैस सिलेंडर तो हैं, लेकिन रास्ता कठिन होने के कारण सालभर में केवल 2 से 3 बार ही सिलेंडर भरवाए जा पाते हैं।


 

पहाड़ के इन गांवों में “बचत” कोई जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुकी है। यहां लोग पेट्रोल इसलिए नहीं बचाते कि वे पर्यावरण अभियान का हिस्सा हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि सड़क, वाहन और सुविधाएं आज तक उनके गांव तक पहुंच ही नहीं पाईं।


 

डुमक गांव की यह तस्वीर उन तमाम दावों पर सवाल उठाती है, जिनमें गांव-गांव तक विकास पहुंचाने की बातें की जाती हैं। एक ओर आधुनिक भारत की तस्वीर पेश की जाती है, तो दूसरी ओर आज भी पहाड़ के कई गांव ऐसे हैं जहां बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए घंटों पैदल सफर तय करने को मजबूर हैं।


 

प्रेम सिंह सनवाल की बात केवल एक बयान नहीं, बल्कि पहाड़ की उस खामोश पीड़ा की आवाज है, जो वर्षों से सड़क, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं का इंतजार कर रही है।


 

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