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नंदा देवी बड़ी जात 2026: नौटी की राजजात स्थगित, तो कुरुड़ से क्यों निकली मां नंदा की यात्रा?

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By Pahadnews24
September 6, 2026 • 1 min read
नंदा देवी बड़ी जात 2026: नौटी की राजजात स्थगित, तो कुरुड़ से क्यों निकली मां नंदा की यात्रा?
नंदा देवी बड़ी जात 2026: नौटी की राजजात स्थगित, तो कुरुड़ से क्यों निकली मां नंदा की यात्रा? (Photo: Pahad News)

चमोली। उत्तराखंड की लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा से गहराई से जुड़ी मां नंदा देवी की बड़ी जात इस वर्ष एक अलग वजह से चर्चा में है। सामान्य तौर पर 12 वर्ष के अंतराल पर होने वाली नंदा देवी राजजात को लेकर 2026 में नौटी और कुरुड़ पक्ष के बीच आयोजन को लेकर अलग-अलग निर्णय सामने आए। जहां श्री नंदा देवी राजजात समिति, नौटी ने मुख्य राजजात को वर्ष 2026 में आयोजित न करने और इसे 2027 में कराने का फैसला लिया, वहीं कुरुड़ से जुड़े हक-हकूकधारियों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने इस वर्ष ही बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया।

 

इसी फैसले के तहत 5 सितंबर 2026 को कुरुड़ स्थित मां नंदा सिद्धपीठ से बड़ी जात कैलाश-होमकुंड की ओर रवाना हुई।

 

नौटी में क्यों स्थगित हुई राजजात?

नंदा देवी राजजात का पारंपरिक आयोजन 12 वर्ष के अंतराल पर होता है। वर्ष 2014 में राजजात आयोजित होने के बाद 2026 में अगली राजजात प्रस्तावित थी।

 

लेकिन वर्ष की शुरुआत में हुई बैठकों के दौरान नौटी की राजजात समिति ने 2026 में यात्रा आयोजित करने को लेकर कई व्यावहारिक और धार्मिक परिस्थितियों पर विचार किया। इनमें मलमास, सितंबर के अंतिम दिनों में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौसम की संभावित प्रतिकूलता, यात्रा मार्ग की व्यवस्थाएं और श्रद्धालुओं की सुरक्षा जैसे विषय प्रमुख रहे।

 

इन परिस्थितियों को देखते हुए समिति ने 2026 की मुख्य राजजात को स्थगित कर 2027 में आयोजित करने का निर्णय लिया।

 

यहीं से नंदा देवी यात्रा को लेकर एक नया अध्याय शुरू हुआ।

 

कुरुड़ में हुई 484 गांवों की महापंचायत

नौटी समिति के निर्णय से कुरुड़ और उससे जुड़े क्षेत्रों के हक-हकूकधारी सहमत नहीं हुए। कुरुड़ में 484 गांवों से जुड़े प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों की महापंचायत आयोजित की गई।

 

महापंचायत में यह तर्क रखा गया कि 2014 के बाद 2026 में नंदा देवी की बड़ी जात का 12 वर्ष का चक्र पूरा हो रहा है। ऐसे में यात्रा को 2027 तक टालने के बजाय 2026 में ही बड़ी जात आयोजित की जानी चाहिए।

 

महापंचायत के बाद कुरुड़ से यात्रा निकालने का निर्णय लिया गया और इसके लिए अलग आयोजन व्यवस्था तैयार की गई।

 

कुरुड़ से ही क्यों?

कुरुड़ को नंदा देवी की परंपरा में महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र माना जाता है। यहां स्थित मां नंदा सिद्धपीठ से जुड़ी स्थानीय धार्मिक परंपराओं और हक-हकूकधारियों की भूमिका लंबे समय से रही है।

कुरुड़ पक्ष का मानना है कि नंदा की पूजा और यात्रा की परंपरा केवल नौटी तक सीमित नहीं है, बल्कि कुरुड़ और उससे जुड़े सैकड़ों गांवों की आस्था भी इससे गहराई से जुड़ी हुई है।

 

इसी धार्मिक और पारंपरिक आधार पर महापंचायत में निर्णय लिया गया कि नौटी में मुख्य राजजात स्थगित होने के बावजूद कुरुड़ से बड़ी जात की परंपरा जारी रखी जाएगी।

 

5 सितंबर को शुरू हुई यात्रा

कुरुड़ में धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-अर्चना के बाद 5 सितंबर 2026 को मां नंदा की बड़ी जात रवाना हुई।

 

मां नंदा की डोली और पारंपरिक छंतोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु यात्रा में शामिल हुए। ढोल-दमाऊं की थाप और ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया।

यात्रा का अंतिम लक्ष्य होमकुंड है, जो नंदा देवी की इस कठिन हिमालयी यात्रा का महत्वपूर्ण धार्मिक पड़ाव माना जाता है।

 

क्या है यात्रा का रूट?

कुरुड़ से शुरू होने वाली बड़ी जात के दौरान यात्रा विभिन्न गांवों और दुर्गम हिमालयी पड़ावों से होकर आगे बढ़ती है। प्रमुख पड़ावों में रामणी, आला, सितेल, कनोंल, वाण और लाटू क्षेत्र शामिल हैं।

इसके बाद यात्रा रणकधार, गैरोली पातल और वेदनी बुग्याल की ओर बढ़ती है। आगे का रास्ता और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

 

यात्रा के उच्च हिमालयी चरण में बगुवावासा, पातर नचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली जैसे कठिन पड़ाव आते हैं। इसके बाद यात्रा होमकुंड की ओर बढ़ती है।

 

करीब 280 से 295 किलोमीटर लंबी बताई जा रही यह यात्रा श्रद्धालुओं के लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर कठिन परीक्षा होती है।

 

चौसिंग्या खाडू का विशेष महत्व

नंदा देवी की बड़ी जात और राजजात की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक चौसिंग्या खाडू है।

चार सींग वाला यह विशेष मेढ़ा नंदा देवी की यात्रा का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार चौसिंग्या खाडू मां नंदा के साथ कैलाश की यात्रा करता है और यात्रा के अंतिम चरण में उसे देवी के साथ कैलाश की दिशा में विदा किया जाता है।

 

2026 की कुरुड़ बड़ी जात में भी चौसिंग्या खाडू यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

राजजात और बड़ी जात में क्या अंतर?

2026 की स्थिति को समझने के लिए ‘राजजात’ और ‘बड़ी जात’ के अंतर को समझना बेहद जरूरी है।

 

नौटी से आयोजित होने वाली श्री नंदा देवी राजजात एक व्यापक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन है, जिसकी अपनी पारंपरिक व्यवस्था, हक-हकूक और आयोजन समिति है।

वहीं कुरुड़ पक्ष ने 2026 में नौटी की राजजात स्थगित होने के बाद अलग से ‘नंदा देवी बड़ी जात’ आयोजित करने का फैसला किया।

 

इसलिए 2026 की कुरुड़ यात्रा को सीधे तौर पर नौटी की राजजात का विकल्प कहना उचित नहीं होगा।

 

इस वर्ष कुरुड़ से बड़ी जात आयोजित हुई है, जबकि नौटी की मुख्य राजजात 2027 में प्रस्तावित है।

 

क्या पहली बार कुरुड़ से निकली है ऐसी यात्रा?

कुरुड़ पक्ष की धार्मिक परंपरा को केवल 2026 के घटनाक्रम से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा। कुरुड़ नंदा देवी की आस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सिद्धपीठ है और यहां से नंदा की लोक परंपराओं का पुराना संबंध बताया जाता है।

 

यही कारण है कि 2026 में नौटी की राजजात स्थगित होने के बाद कुरुड़ से जुड़े हक-हकूकधारियों ने अपनी परंपरा और धार्मिक अधिकारों के आधार पर बड़ी जात निकालने का निर्णय लिया।

 

2027 में क्या होगा?

नौटी की राजजात समिति के निर्णय के अनुसार मुख्य नंदा देवी राजजात 2027 में आयोजित की जाएगी।

 

इस प्रकार वर्ष 2026 नंदा देवी की परंपरा के लिहाज से असाधारण बन गया है। एक ओर नौटी से मुख्य राजजात को 2027 तक स्थगित किया गया, वहीं दूसरी ओर कुरुड़ से 2026 में ही बड़ी जात शुरू हो गई।

 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में नौटी और कुरुड़ की परंपराओं के बीच किस तरह समन्वय स्थापित होगा।

 

आस्था, परंपरा और पहाड़ की पहचान

नंदा देवी की यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह उत्तराखंड के पहाड़ों की लोक संस्कृति, सामुदायिक परंपरा, गांवों की भागीदारी, ढोल-दमाऊं, छंतोली और हिमालयी जीवनशैली का भी प्रतीक है।

 

मां नंदा को उत्तराखंड की बेटी के रूप में देखा जाता है। उनकी कैलाश की ओर यात्रा को बेटी की विदाई की भावनात्मक परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

 

इसीलिए नंदा की डोली जब पहाड़ों के गांवों से होकर ऊंचे हिमालय की ओर बढ़ती है तो हजारों लोगों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़ने का अवसर होती है।

 

निष्कर्ष

वर्ष 2026 में कुरुड़ से नंदा देवी की बड़ी जात निकलने के पीछे मुख्य कारण नौटी की मुख्य राजजात को 2027 तक स्थगित किए जाने के बाद कुरुड़ और उससे जुड़े 484 गांवों के हक-हकूकधारियों का इस वर्ष ही बड़ी जात निकालने का सामूहिक निर्णय है।

 

इसलिए 2026 के घटनाक्रम को समझते समय यह अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है कि कुरुड़ से निकली यात्रा ‘नंदा देवी बड़ी जात 2026’ है, जबकि नौटी की मुख्य ‘नंदा देवी राजजात’ 2027 में प्रस्तावित है।

 

मां नंदा की आस्था हालांकि किसी एक स्थान या आयोजन तक सीमित नहीं है। नौटी हो या कुरुड़—दोनों ही उत्तराखंड की उस गहरी लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, जिसने सदियों से पहाड़ के समाज को एक सूत्र में बांधे रखा है।


 

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