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उत्तराखंड में शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात, कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली

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By Pahadnews24
September 6, 2026 • 1 min read
उत्तराखंड में शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात, कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली
उत्तराखंड में शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात, कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई डोली (Photo: Pahad News)

चमोली। उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा शनिवार, 5 सितंबर से शुरू हो गई। 12 वर्षों में एक बार आयोजित होने वाली यह ऐतिहासिक यात्रा चमोली के सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा राजराजेश्वरी की डोली के कैलाश के लिए रवाना होने के साथ शुरू हुई। डोली के प्रस्थान के दौरान पूरा कुरुड़ क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी डोली के साथ यात्रा में शामिल हुए।

 

पांच दिवसीय पूजा-अर्चना के बाद हुई विदाई

सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा राजराजेश्वरी की पांच दिवसीय पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद डोली को कैलाश के लिए विदा किया गया। विदाई के दौरान श्रद्धालुओं में भावुकता देखने को मिली। ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने मां नंदा की डोली के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

करीब 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा

मां नंदा की बड़ी जात यात्रा को हिमालयी क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में माना जाता है। करीब 280 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली विभिन्न गांवों और पड़ावों से होते हुए हिमालय की ओर बढ़ेगी। सामान्य लोकजात यात्रा में डोली वेदनी कुंड तक पहुंचती है, जबकि बड़ी जात के दौरान यात्रा को आगे बढ़ाकर होमकुंड तक ले जाने की परंपरा है।

यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर ग्रामीण श्रद्धालुओं द्वारा मां नंदा की डोली का स्वागत किया जाएगा। पारंपरिक ढोल-नगाड़ों और मां नंदा के जयकारों से यात्रा मार्ग भक्तिमय बना हुआ है।

 

30 सितंबर को होमकुंड में होगा समापन

बड़ी जात यात्रा का मुख्य धार्मिक अनुष्ठान 30 सितंबर को होमकुंड में प्रस्तावित है। यहां मां नंदा की डोली की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होने के बाद यात्रा का समापन होगा।

 

मां नंदा को उत्तराखंड की लोक परंपरा में बेटी के रूप में माना जाता है। लोकजात यात्रा के दौरान मां नंदा अपने मायके से ससुराल कैलाश की ओर प्रस्थान करती हैं। बड़ी जात इसी परंपरा का विस्तृत और विशेष धार्मिक स्वरूप मानी जाती है।

इस बार क्यों निकाली जा रही दो यात्राएं?

इस वर्ष नंदा देवी यात्रा को लेकर नौटी आयोजन समिति और कुरुड़ पक्ष के बीच आयोजन को लेकर अलग-अलग मत सामने आए। नौटी आयोजन समिति द्वारा इस वर्ष नंदा राजजात की तैयारी की जा रही थी, लेकिन मलमास का हवाला देते हुए यात्रा को स्थगित कर दिया गया।

 

इसके बाद कुरुड़ पक्ष ने यात्रा के शुरुआती पड़ाव ईड़ाबधाणी को लेकर अपनी आपत्ति जताई और कहा कि नंदा यात्रा की परंपरा में कुरुड़ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कुरुड़ पक्ष का कहना है कि यात्रा की पुरानी धार्मिक परंपरा में इसे ‘बड़ी जात’ के रूप में जाना जाता था, जबकि बाद के आयोजनों में इसे ‘राजजात’ नाम दिया गया और राजपरिवार से जोड़ा गया।

 

कुरुड़ पक्ष के अनुसार समय के साथ नंदा राजजात में नौटी और कांसुआ के कुंवरों की भूमिका बढ़ी, जबकि कुरुड़ की भूमिका कम हुई। हालांकि, पारंपरिक और धार्मिक मान्यताओं में कुरुड़ का महत्व आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी पृष्ठभूमि में नौटी आयोजन समिति द्वारा यात्रा स्थगित किए जाने के बाद कुरुड़ से बड़ी जात यात्रा निकालने का निर्णय लिया गया।

 

12 साल बाद आयोजित हो रही इस यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है और अगले कई दिनों तक चमोली का हिमालयी क्षेत्र मां नंदा के जयकारों से गूंजता रहेगा।


 

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